Monday, March 3, 2014

हर रोज की क़ैद है, हर रोज की रिहाई है ... !!!

हर रोज की क़ैद है, हर रोज की रिहाई है 
ज़िदगी, ये तू किस दौर मैं ले आई है । 

व्यवहारिकता के चलन मैं, जो अनदेखी हुई एक बार 
"जिज्ञासा" है, की चेतना से रूठी ही चली आई है । 

कभी बेफिक्री मैं कई दिन यू ही कट जाया करते थे 
जाने कब से इत्मिनान की, एक शाम भी ना गुजर पाई है । 

याद नही कि, कब एक नया ख़याल आया था
समझ पर ना जाने, ये कैसी सरहदे उग आई हैं । 

खरीदता रहता हूँ आजकल बाज़ार से ख़ुशिया
ये मेरे घर के सुकून मैं, कैसी कमी आई है । 

अक्सर तोलने लगता हूँ लोगो की नियते 
जहन पर, ना जाने, ये कैसी लकीरे खिंच आई हैं । 

मैने तो ना सीखा था, युँ  शक करना कभी 
जाने कहाँ से, ये भी आदत लग आई है ॥ 



हर रोज की क़ैद है , हर रोज की रिहाई है 
जो छूटी एक बार "मासूमियत", तो फिर लौट के ना आई है । 

जिसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया 
ये जंज़ीरे भी, उसी ने पहनाई हैं । 

जिस आग से सिकती थी रोटियाँ
ये बस्ती भी तो उसी ने जलाई हैं । 

अक्सर एक शाम, जो याद, मुस्कान के आई चेहरे पे
सहर तक पलखे भी, उसी ने रुलाई हैं । 

जिन्होने मिलकर संजोया-सँवारा है, मेरी संवेदनाओ को 
खवाबो पे निगरानी भी तो, उन्ही ने बिठाई है । 

जिस विश्वास ने होसला दिया था लडने का 
अब कत्ल की तोहमत भी उसी पे आई है । 

लगता है की वो मुझ से कुछ कहना चाहती है 
अक्सर अंधेरो मैं दिखती, ये जाने किस की परछाई है ॥ 



हर रोज की क़ैद है, हर रोज की रिहाई है 
बेवजह ढल गया, फिर एक दिन, जहन पर ये कैसी थकान छाई है । 

बार-बार लौट कर, वहीं पर आ जाता हूँ 
जिंदगी, ये तूने कैसी परिधि बनाई है । 

सूखे पत्ते हैं कि, अब उड़ते ही नही 
मौसम मैं, हवाओं की, ये कैसी कमी छाई  है । 

कभी कुछ बातों, इरादो और ख्वाहिशों पे, बड़ा नाज़ था हमे 
ना जाने, अब इस राख मैं, कहीं कोई चिंगारी भी बच पाई है । 

जमाने ने इतना समझा दिया की, समझ ही अब बोझ लगती है 
लगता है, संवेदनाओ की मिट्टी कटते-कटते,  क्षितिज के पार चली आई है ।

इंसान मैं ही, इंसान को क़ैद कर के रख दे
इस जमाने की, बड़ी ज़ालिम ये रुसवाई है । 

उसका तो फरमान आ गया, कि काफ़िर से ना मिल 
मेरा तो सब-कुछ ही छीन लिया, तेरी कैसी ये खुदाई है ॥ 

2 comments:

ajay said...

बार-बार लौट कर, वहीं पर आ जाता हूँ
जिंदगी, ये तूने कैसी परिधि बनाई है ।

maja aa gaya :)

Ashish said...

"लगता है की वो मुझ से कुछ कहना चाहती है अक्सर अंधेरो मैं दिखती, ये जाने किस की परछाई है ॥ "

-(हाउ तो नही है कोई) :) पर सही कहा रे, अपने हाउ से ज़्यादा डरावना भी क्या है. बहुत खूब.

सूखे पत्ते हैं कि, अब उड़ते ही नही मौसम मैं, हवाओं की, ये कैसी कमी छाई है ।

- ahmm... सूखे पत्ते और हवओ की कमी.. तुम ऐसे भी हो? :)