Monday, November 30, 2009

होंसला तो चले ..

ठहरी हुई मंजिलो से आगे, रास्ता तो चले
मैं थक भी जाऊ, मगर ये होंसला तो चले

अंधेरो मैं खवाब भी डगमगाने लगे हैं
सहर तक, कहीं कोई समां तो जले

ये विराना पलकों को बंज़र न कर दे
साहिल से कोई लहर आकर तो मिले

शब्दों के गलियारे कहीं गुमनाम ना रह जाए
कागज़ के पन्नो से निकल कर जिंदगी तो चले

बाज़ार की रोनक है कि बस बढती ही जाती है
दीवारो से रिश्ते लहू का भी कोई हिसाब तो मिले

फिर काफ़िर को बस्ती से निकल जाने का हुक्म आया है
कभी इन हुक्मगारो की नीयत पर भी कोई गुफ्तगू तो चले

विस्वास की सरहदों पे लाशे तो बो दी हैं हमने
इन लकीरों मैं हकीकत कहाँ दफन है, कुछ पता तो चले

सूखे पत्तो की भीड़ से जमी ढकने लगी है
पतझड़ के मोसम मैं कहीं से हवा तो चले

Thursday, July 2, 2009

और ...

खामोसियो के गुनाह, और भी हैं
इन अंधेरो मैं पनाह, और भी है !!

नम पलकों मैं गुन्जाएश, और भी है
कुछ दर्द की फरमाइश, और भी है !!

इस रहगुजर की दास्तान और भी हैं
कुछ आईने अनजान और भी हैं !!

कहीं लफ्ज़ गुमनाम और भी हैं
कुछ समां के बयान और भी हैं !!

सुर्ख गालो पे निशान और भी हैं
इस बस्ती मैं श्मसान और भी हैं !!

इन लकीरो के फरमान और भी हैं
इस समुन्दर मैं तूफान और भी हैं !!

फासले, दरमियान और भी हैं
होंसलों के इम्तिहान और भी हैं !!!

Thursday, March 19, 2009

कभी फुरसत में मिलने घर आना तुम ...

कभी फुरसत में मिलने घर आना तुम
और घडी वहीं पर कहीं भूल आना तुम

मैं भी वक़्त के गुजरने की हर सूरत हटा दूगा घर से
बस निगाहों में वही मासूमियत भर लाना तुम

साथ बैठ कर फिर से बचपन के नगमे दोहराएँगे
सूखे हुए फूलों से भरी वो डायरी संग ले आना तुम

फिर से बेफिक्र हो, बादलों के टुकडों मैं शकले ढूँढ कर कहानिया बनाएगे
मिटटी के घरोदो में ढली, आशियाने की वो सूरत, पलकों मैं छुपा लाना तुम

देर तक, ढलती शाम के संग, फिर से कुछ ख्वाब नए बनायेगे
और बेखबर कदमो के निसा बनाते, फिर कोई धुन गुनगुनाना तुम

फिर एक दूजे का हाथ थामे, बचपन की शरारतो के किस्से बार-बार दोहोराएगे
और हँसते हँसते जब दोनों ही रुक जाए, तो फिर बेवजह यू ही हँस जाना तुम

जिक्र चलेगा पुरानी बातो का, और फिर एक दूजे को वही पुराने नामो से बुलाएगे
शायद उस दिन भी बारिश के बूंदे बरसे, और फिर कोई कविता लिख जाना तुम

फिर जब बाते ख़त्म होंगी और आधे अधूरे लफ्ज़ खामोशी मैं घुल जायेगे
तुम्हारे चहरे पे ठहर जाएगी मेरी नज़रे, और मेरी नजरो के संग ठहर जाना तुम

उदासी, खामोशी संग गहराने लगेगी, और जब सवाल लबो पे आकर रुक जायेगे
तब जो बात छुपी है अब तक सब से, वो बात चुपक -चुपके कह जाना तुम

तुम्हारी आखे नम होंगी और तुम्हे बहलाने को मेरी याददाश्त के सब लतीफे कम पड जायेगे
तब मेरी बनाई कोफी पीते, चीनी कम है कहकर, खुद ही मुस्कुरा जाना तुम

और अचानक हम एक दूजे का हाथ थामे, चाँद को देखने छत पर चले जाएगे
तब जी भर कर देख लूगा तुम्हे, बस कुछ पल को चाँद से नज़रे मत हटाना तुम

तुम कहोगी, कितना वक़्त बीत गया कभी सोचा न था, यु इतने साल गुजर जायेगे
मैं कहूगा की अब नीचे चलते हैं, पर जिद कर के कुछ देर ओर वहीं रुक जाना तुम

मैं कहूगा के तुम बिलकुल बदली नहीं, और दोनों वहीं बैठ जायेगे
मैं बस अब सुनता रहूगा, कुछ भी, बस कुछ भी कहते जाना तुम

और धीरे धीरे पुराने सब खवाब फिर से पलकों पे छा जायेगे
तुम्हारी किताब मैं, जो लिख कर मैं भूल गया, फिर वो कविता मुझे सुनाना तुम

तुम कहोगी की चलो अब चलते हैं , वर्ना यहीं पर सो जायेगे
इस बार मैं बैटा रहूगा, और खडी हो कर फिर से बैठ जाना तुम

मैं कहूगा तुम्हे अब तक याद है, मुझे लगा हम सब कुछ भूल जायेगे
सब तुम्हारी तरह भुलक्कड़ नहीं, ये कहकर एक बार फिर हँस जाना तुम

और यू ही धीरे - धीरे बातो मैं खाव्बो को जीते, हम रात को सहर तक जोड़ जाएगे
"वक़्त के संग ढलना नहीं, लम्हे मैं जीना है जिन्दगी", ये कह कर एक बार फिर बिछड़ जाना तुम

फिर सोचता हूँ की शायद संग हमारे अब लम्हे कभी यू न गुजर पायेगे
ये बाते, ये ठहाके, ये आँसू, ये राते - कुछ भी न हों, फिर भी यू ही कभी मिलने आना तुम !

Monday, February 16, 2009

देव समाज

सिसकती चीखे , तड़पती लाशे,
आओ हम कुछ नोट तराशे !
टूटती आशा मैं छूटती सांसे
आओ एक और मछली जाल में फासे !!

बेबसी में सिसकता है कही आज कोई
चलो सजाये नया एक साज कोई !
जेहरीली हवाओ में है फिर मौत कि बातें
चलो लगाये हम कुछ और ठहाके !!

कापते है हाथ, डरे है चहरे
चलों लगाये इन पर कुछ और पहरे !
मासुम कि आखो में फिर आँसू है आये
चलो आज फिर एक जशन मनाये !!

माँ कि छाती में दूद फिर सुप्त होने लगा है
बिलखता मासूम भूके पेट ही सोने लगा है !
चलो मन्दिर में कुछ दूद चढाये
आओ हम भी कुछ देवतव को पाये !!

मासूम कली फिर बड़ी होने लगी है
पल्को पर अब सपने सजोने लगी है !
चलो सपनो को फिर यथार्थ से मिलाये
द्रौपदी का चीर हरण आज फिर से दोहराये !!

कही किसी से आज हाथ मिलाता है कोई
हमारे बनाये नियमो को झुटलाता है कोई !
चलो धर्म का एक नया तांडव रचाए !
लाशो पर आज फिर एक नयी दीवार उठाये !!

खामोश सिसकिया, कही शोर न हो जाये
मज़बूरी कि जड़े, कही कमजोर न हो जाये !
चलो अज्ञान पर विश्वास कि कुछ परते जमाये
आओ "देव समाज" के कुछ नये नियम बनाये !!

आज फिर लोगो के विश्वास लड़े है
इन्सानियत के हाथो में फिर बरछी-किरपान चदे है !
फिर रोते हुए हाथो ने सिंदूर मला है
श्रोनित आज फिर गंगा से मिला है !
आओ मुखौटे बदल कर कुछ हम भी रो ले
खून सने ये अपने हाथ कुछ धो ले !!

हमारी नशल अब जवान होने लगी है
इन्सानी शकल अब गुलाम होने लगी है !
आओ "आजादी" के कुछ नये तर्क दे
मानव जीवन को कुछ नये अर्थ दे ...!!!