ढूंड ही लेंगे एक दिन ...
खवाबो के ठिकानो को
तेरे होटो की मुस्कानो को ..
दिल्लगी के बहानो को
उलफत के अफ़सानो को ..
बेपरवाह तेरी हँसी को
पलको मैं छुपी नमी को ..
तेरी डायरी मैं मुरझाए फुलो को
पुराने बक्से मैं लगी धूलो को ..
बचपन के क़िस्सो को
जहन के टूटे हिस्सो को ...
ढूंड ही लेंगे एक दिन ...
तेरे काज़ल की लकीरो को
ख़यालो मैं डूबी तस्वीरो को ..
यूही तेरे गुनगुनाने को
वो बिखरे बाल सुलझाने को ..
बेचेन तेरी करवटो को
चादर पर सलवटो को ..
तेरी मासूम शरारतो को
आँखो मैं लिखी इबारतो को ..
वो भीड़ मैं तेरे शरमाने को
चुप रहकर भी सब कह जाने को ...
ढूंड ही लेंगे एक दिन ...
बारिस मैं फैले तेरे हाथो को
अपना अस्तित्व तलाशते जज्बातो को ..
ज़ीने की ख्वाइशो को
ज़माने की आज़माइशो को ..
एक दूजे के ख्वाबो को
जिन्दगी के सब जवाबो को ..
उम्मीदो के गलियारो को
होसलो के किनारो को ..
विश्वास की श्याही को
एक दूजे की रिहाई को ... !!!
