Sunday, August 22, 2010

... यु ही

जिंदगी तेरी कहानी समझ नहीं आती
खवाब आते हैं तो नींदे नहीं आती !

हवाओ से समां बचाते बहुत जले हैं ये हाथ
महदी अब इन हतेलियो पर कोई रंग नहीं लाती !

नासमझी के कुछ सवाल आज भी वही हैं
क्यों चंद बूंदे भी समंदर से सहरा नहीं आती !

काफिले बहुत डरते हैं लूटेरो से यहाँ
समां अब तमाम रात यहाँ जलाई नहीं जाती !

वो बदलो के टुकडो में तो ढूँढता है खवाब
बारिस के बूंदों में जिंदगी नजर नहीं आती !

आज शाम से ही वो चुपचाप बैठा है
मका की आखरी दीवार उससे गिराई नहीं जाती !

रास्ता मुकदर का वो आज फिर छोड़ आया है
लाशो पे इमारत उससे बनाई नहीं जाती !

रात भर वो बच्चो को सुनाता रहा कहानियाँ
बाज़ार से रोटी, उसे चुरानी नहीं आती !

गुलदान के फूल बदलना वो अक्सर भूल जाता है
उसे खुशियाँ, आज भी, गले लगानी नहीं आती !

बड़े लोगो से वो अक्सर फ़ासला रखता है
दुनियादारी उसे आज भी निभानी नहीं आती !!