रात को सोते से ज़गाकर, खामोशी मैं गुनगुनाता कौन है
ये रहगुज़र तो सुनसान है, फिर मूझे बुलाता कौन है !
बचपन की ख्वाईशो मैं डूबे, वो लम्हे पुराने तो सब बीत गए
अक्सर भीड़ मैं सुन लेता हूँ जिसे, वो धुन फिर बजाता कौन है !
गुमनाम हवेली जिसकी पनाह मैं सिर्फ सूनापन है
हर शाम उसकी खिड़की पे आकर ये मुस्कुराता कौन है !
ये कदम तो टहरते नहीं फूलो के महकते गुलसन मैं भी
तो फिर मिटटी के टुकडो मैं भी, खुसबू ढूँढ लाता कौन है !
मासूमियत को ख्वाबो मैं ढालते, बचपन के सांचे तो सब टूट गए
फिर बेखबर हो सब से, बदलो के टुकडो मैं शकले बनाता कौन है !
ये साहिल जहाँ हर कोई मिट्टी के घरोदे बनाने मैं मसरूफ़ है
वहां मेरा हाथ पकड़कर, ये लहरों मैं ले जाता कौन है !
उजड़ी गुमनाम बस्ती जहाँ से अब कोई नहीं गुजरने वाला
वहां पेड तले हर रात, ये दीया जला जाता कौन है !
ये गावं जहाँ बारिस की बूंदे गिरे जमाना हो गया
वहां ये कागज़ की नाव से, बच्चो को बहलाता कौन है !
जस्न की ये महफिल जहाँ सिर्फ मदहोशी मैं छलकते जाम हैं
वहां खामोशी ओढे चुपके-चुपके ये पलके भिगाता कौन है !
ये बस्तिया जहाँ शाम ढलते-ढलते जिंदगियां भी ढल जाती हैं
वहां पूरी रात श्याही से कागज़ रंगते, ये मोमबतियां पिघलाता कौन है !
रुके हुए काफिलों से ये बस्तिया, जहाँ आखे एक आहट पे चोंक जाती हैं
वहां भूक से जगे हुए बच्चो को, ये परियो की कहानिया सुनाता कौन है !
रास्ते बदल गए, मंजिलो को छोडे हुए भी अब ज़माना हो गया
फिर निशा के टूटते-टूटते, मूझे वापस उन्ही मोडो तक छोड़ आता कौन है !
ये घर जहाँ उम्मीद अब दरवाज़े पे आकर लौट जाती है
वहां रोज आकर मेरे ख्वाबो को नई उम्र दे जाता कौन है !
एक अर्सा हो गया है , इस घर से जिंदगी को गए हुए
फिर मेरे आगन मैं, ये बारिस के बूंदों मैं हाथ फैलाता कौन है !
उम्र के संग ज़माने मैं रमते हुए, जब लगता है की अहसास संभलने लगे हैं
फिर अचानक गीली हथेलियों से, इस तपते ज़हन को छु जाता कौन है !
इमारत की चारदीवारियों बढाते, अपने दायरों को समझते, सवारते खुश रहता हूँ
फिर अक्सर रातो को आकर, मेरे सिरहाने पर तकिये को भीगा जाता कौन है ...!!!
Sunday, November 9, 2008
Friday, November 7, 2008
क्या लिखू ...
फिर रातो को बारिस की बूंदों संग, दिल मैं गहराया कोई ख्याल लिखू
या फिर कहीं बचपन की पलकों से छलका, खामोश कोई सवाल लिखू !
संकीन मानसिकता के दायरों को, मानवीय सर्जन छमता का जवाब लिखू
या विकास की परिभासा पर लिपटी हुई, स्वार्थ परते बेहिसाब लिखू !
संस्कृति का दामन थामे हुए, लाखो का विस्वास लिखू
या मानव जीवन को गौर्ण करता, देवत्व का अभिश्राप लिखू !
नई उमीदो मैं डूबा हुआ, अमन का पैगाम लिखू
या इतिहास के पन्नो पे बिखरे, लहू के निशान लिखू !
मासूमो के आदर्शो मैं, इन्सानिअत के लिए पनाह लिखू
या खामोसी के संग गहराए, इस सभ्यता के गुनाह लिखू !
इन्सान से इन्सान को जोड़ने के नए होसले लिखू
या लकीरों संग पनपते, मीलो लम्बे फासले लिखू !
सभ्यता के साथ बढ़ते हुए, नए कला के साहकार लिखू
या मानव मूल्यों को बेचते-खरीदते, अर्थतंत्र का व्यापार लिखू !
संगीत की धुन पे थिरकते, मदहोशी मैं छलकते जाम लिखू
या हकीकत की सरहदों पे थक चुकी, उमीदो पर विराम लिखू !
हजारो मीलो लम्बी नहरों से जुड़ते हुए रगिस्तान लिखू
या लम्हा-लम्हा मायूसी मैं डूबी हजारो पलके वीरान लिखू !
नए दौर के नए होसलो संग, उमीदो के बरसात लिखू
या खोकले आदर्शो के संग तनहा, शयाह ये काली रात लिखू !
ख्वाबो की श्याही से कागज़ रंगते, होसलो मैं ढली एक शाम लिखू
या फिर मायूस पलकों से गालो तक लुढ़की, दो बूंदों का अंजाम लिखू ...!!!
या फिर कहीं बचपन की पलकों से छलका, खामोश कोई सवाल लिखू !
संकीन मानसिकता के दायरों को, मानवीय सर्जन छमता का जवाब लिखू
या विकास की परिभासा पर लिपटी हुई, स्वार्थ परते बेहिसाब लिखू !
संस्कृति का दामन थामे हुए, लाखो का विस्वास लिखू
या मानव जीवन को गौर्ण करता, देवत्व का अभिश्राप लिखू !
नई उमीदो मैं डूबा हुआ, अमन का पैगाम लिखू
या इतिहास के पन्नो पे बिखरे, लहू के निशान लिखू !
मासूमो के आदर्शो मैं, इन्सानिअत के लिए पनाह लिखू
या खामोसी के संग गहराए, इस सभ्यता के गुनाह लिखू !
इन्सान से इन्सान को जोड़ने के नए होसले लिखू
या लकीरों संग पनपते, मीलो लम्बे फासले लिखू !
सभ्यता के साथ बढ़ते हुए, नए कला के साहकार लिखू
या मानव मूल्यों को बेचते-खरीदते, अर्थतंत्र का व्यापार लिखू !
संगीत की धुन पे थिरकते, मदहोशी मैं छलकते जाम लिखू
या हकीकत की सरहदों पे थक चुकी, उमीदो पर विराम लिखू !
हजारो मीलो लम्बी नहरों से जुड़ते हुए रगिस्तान लिखू
या लम्हा-लम्हा मायूसी मैं डूबी हजारो पलके वीरान लिखू !
नए दौर के नए होसलो संग, उमीदो के बरसात लिखू
या खोकले आदर्शो के संग तनहा, शयाह ये काली रात लिखू !
ख्वाबो की श्याही से कागज़ रंगते, होसलो मैं ढली एक शाम लिखू
या फिर मायूस पलकों से गालो तक लुढ़की, दो बूंदों का अंजाम लिखू ...!!!
Wednesday, November 5, 2008
राह तेरी...
जीवन नहीं है ठहर कहीं, सिर्फ समय सत्र पूरा बिताने को
विचारो के विकास का हर मोती नहीं, सिर्फ धूल मैं मिल जाने को !
जीवन श्रंखलाओ मैं है दूरिया बड़ी, तुझे सेतु कई बनाने हैं
शिखाए कितनी ही बुझ चुकी, तुझे दीपक नए जलाने हैं !
उठा कदम इन राहों की मंजिन, अभी इन निशानों से बहुत दूर है
सूरज ढलता है जहाँ खुशियो की बाहों मैं, वो छितिज़ इस शाम से बहुत दूर है !
उम्मीद के चिरागों को, जिस आगन मैं, सहर तक जलते जाना है
हसरतो की मिटटी से, खवाबो का वो आशियाना तुझे बनाना है .!
वक़्त की ये उडती धुल, जिसे कभी मिटा ना पाए
समय की तपती रेत पर, वो निशा तुझे छोड़ जाना है ...!!!
विचारो के विकास का हर मोती नहीं, सिर्फ धूल मैं मिल जाने को !
जीवन श्रंखलाओ मैं है दूरिया बड़ी, तुझे सेतु कई बनाने हैं
शिखाए कितनी ही बुझ चुकी, तुझे दीपक नए जलाने हैं !
उठा कदम इन राहों की मंजिन, अभी इन निशानों से बहुत दूर है
सूरज ढलता है जहाँ खुशियो की बाहों मैं, वो छितिज़ इस शाम से बहुत दूर है !
उम्मीद के चिरागों को, जिस आगन मैं, सहर तक जलते जाना है
हसरतो की मिटटी से, खवाबो का वो आशियाना तुझे बनाना है .!
वक़्त की ये उडती धुल, जिसे कभी मिटा ना पाए
समय की तपती रेत पर, वो निशा तुझे छोड़ जाना है ...!!!
कुछ नही ...
पानी संग मिटटी कटती जाती है,
मगर कोई खाई पटती जाती नहीं !
समझ की दरारे तो रिश्ती जाती हैं,
मगर दायरे की लकीरे मिट पाती नही !!
हजारो मीलो फैले फसलो पे तो बरसती हैं घटाए,
मगर कोई बूँद भटकती, इस रेगिस्तान तक आती नही !
जिंदगी नए सवाल तो बुनती जाती है,
मगर कोई जवाब छोड़ कर जाती नही !!
बस मिटटी साचो मैं ढलती जाती है,
मगर कहीं कोई शक्ल उभर पाती नही !
अक्सर शाम ढलते ही रोशन हो जाती हैं,
मगर चिरागों की लो, सहर तक जल पाती नही !!
खामोसी मैं अक्सर जाहिर तो हो जाती है
मगर वो कहानी अब कही जाती नही !
हवाओ की सरसराहट तो सुन जाती है,
मगर उधर से अब कोई सदा आती नही !!
आगन मैं बारिस की बूंदे तो गिर जाती हैं,
मगर मिट्टी से अब वो खुशबू आती नही !
महफिले तो संगीत पर थिरकती जाती हैं,
मगर अब खामोशी कोई धुन गुनगुनाती नही !!
तनहा अक्सर शाम तो ढल जाती है,
मगर खयालो से उदासी ढल पाती नही !
सुबह खिड़की तो खुल जाती है,
मगर कमरे से जिंदगी बाहर निकल पाती नही !!
ख्वाइशे हसरतों संग दायरे लांग कर जाती तो हैं,
मगर उम्मीद का दामन थामे लौट कर आती नही !
हवाए फूलो की महक तो साथ लाती है,
मगर सूखे हुए पत्ते उडा कर ले जाती नही !!
निगाहे अक्सर शून्य मैं तो ठहर जाती है,
मगर कुछ पल आईने के संग ठहर पाती नही !
ये श्याही कागज तो रंगती जाती है,
मगर अंधियारे मैं कोई रंग भर पाती नही ...!!!
मगर कोई खाई पटती जाती नहीं !
समझ की दरारे तो रिश्ती जाती हैं,
मगर दायरे की लकीरे मिट पाती नही !!
हजारो मीलो फैले फसलो पे तो बरसती हैं घटाए,
मगर कोई बूँद भटकती, इस रेगिस्तान तक आती नही !
जिंदगी नए सवाल तो बुनती जाती है,
मगर कोई जवाब छोड़ कर जाती नही !!
बस मिटटी साचो मैं ढलती जाती है,
मगर कहीं कोई शक्ल उभर पाती नही !
अक्सर शाम ढलते ही रोशन हो जाती हैं,
मगर चिरागों की लो, सहर तक जल पाती नही !!
खामोसी मैं अक्सर जाहिर तो हो जाती है
मगर वो कहानी अब कही जाती नही !
हवाओ की सरसराहट तो सुन जाती है,
मगर उधर से अब कोई सदा आती नही !!
आगन मैं बारिस की बूंदे तो गिर जाती हैं,
मगर मिट्टी से अब वो खुशबू आती नही !
महफिले तो संगीत पर थिरकती जाती हैं,
मगर अब खामोशी कोई धुन गुनगुनाती नही !!
तनहा अक्सर शाम तो ढल जाती है,
मगर खयालो से उदासी ढल पाती नही !
सुबह खिड़की तो खुल जाती है,
मगर कमरे से जिंदगी बाहर निकल पाती नही !!
ख्वाइशे हसरतों संग दायरे लांग कर जाती तो हैं,
मगर उम्मीद का दामन थामे लौट कर आती नही !
हवाए फूलो की महक तो साथ लाती है,
मगर सूखे हुए पत्ते उडा कर ले जाती नही !!
निगाहे अक्सर शून्य मैं तो ठहर जाती है,
मगर कुछ पल आईने के संग ठहर पाती नही !
ये श्याही कागज तो रंगती जाती है,
मगर अंधियारे मैं कोई रंग भर पाती नही ...!!!
Tuesday, November 4, 2008
फिर ...
फिर किसी ने वो कहानी कही
जो तमाम रात ढलते-ढलते भी बेजुबानी रही !
यु तो उम्र गुजरी है साथ चलते-चलते
फिर भी कितने फासलों पे ये जिंदगानी रही !
जहाँ भर की खुशिया यु तो हर दौर मैं हासिल रही
फिर भी जैसे, कहीं ख्वाबो पे किसी की निगरानी रही !
यु तो हसरतो की अजमाएशो में आशियाने नए ढलते ही गए
पर कहीं समझ की सरहद पर कुछ सवालो की कुर्बानी रही !
शायद अब तक टूट कर बिखर जाते कुछ रिश्ते
आवाजो के शोर तले कुछ खामोशियों की महेरबानी रही !!!
जो तमाम रात ढलते-ढलते भी बेजुबानी रही !
यु तो उम्र गुजरी है साथ चलते-चलते
फिर भी कितने फासलों पे ये जिंदगानी रही !
जहाँ भर की खुशिया यु तो हर दौर मैं हासिल रही
फिर भी जैसे, कहीं ख्वाबो पे किसी की निगरानी रही !
यु तो हसरतो की अजमाएशो में आशियाने नए ढलते ही गए
पर कहीं समझ की सरहद पर कुछ सवालो की कुर्बानी रही !
शायद अब तक टूट कर बिखर जाते कुछ रिश्ते
आवाजो के शोर तले कुछ खामोशियों की महेरबानी रही !!!
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