हर रोज की क़ैद है, हर रोज की रिहाई है
ज़िदगी, ये तू किस दौर मैं ले आई है ।
व्यवहारिकता के चलन मैं, जो अनदेखी हुई एक बार
"जिज्ञासा" है, की चेतना से रूठी ही चली आई है ।
कभी बेफिक्री मैं कई दिन यू ही कट जाया करते थे
जाने कब से इत्मिनान की, एक शाम भी ना गुजर पाई है ।
याद नही कि, कब एक नया ख़याल आया था
समझ पर ना जाने, ये कैसी सरहदे उग आई हैं ।
खरीदता रहता हूँ आजकल बाज़ार से ख़ुशिया
ये मेरे घर के सुकून मैं, कैसी कमी आई है ।
अक्सर तोलने लगता हूँ लोगो की नियते
जहन पर, ना जाने, ये कैसी लकीरे खिंच आई हैं ।
मैने तो ना सीखा था, युँ शक करना कभी
जाने कहाँ से, ये भी आदत लग आई है ॥
हर रोज की क़ैद है , हर रोज की रिहाई है
जो छूटी एक बार "मासूमियत", तो फिर लौट के ना आई है ।
जिसने उंगली पकड़कर चलना सिखाया
ये जंज़ीरे भी, उसी ने पहनाई हैं ।
जिस आग से सिकती थी रोटियाँ
ये बस्ती भी तो उसी ने जलाई हैं ।
अक्सर एक शाम, जो याद, मुस्कान के आई चेहरे पे
सहर तक पलखे भी, उसी ने रुलाई हैं ।
जिन्होने मिलकर संजोया-सँवारा है, मेरी संवेदनाओ को
खवाबो पे निगरानी भी तो, उन्ही ने बिठाई है ।
जिस विश्वास ने होसला दिया था लडने का
अब कत्ल की तोहमत भी उसी पे आई है ।
लगता है की वो मुझ से कुछ कहना चाहती है
अक्सर अंधेरो मैं दिखती, ये जाने किस की परछाई है ॥
हर रोज की क़ैद है, हर रोज की रिहाई है
बेवजह ढल गया, फिर एक दिन, जहन पर ये कैसी थकान छाई है ।
बार-बार लौट कर, वहीं पर आ जाता हूँ
जिंदगी, ये तूने कैसी परिधि बनाई है ।
सूखे पत्ते हैं कि, अब उड़ते ही नही
मौसम मैं, हवाओं की, ये कैसी कमी छाई है ।
कभी कुछ बातों, इरादो और ख्वाहिशों पे, बड़ा नाज़ था हमे
ना जाने, अब इस राख मैं, कहीं कोई चिंगारी भी बच पाई है ।
जमाने ने इतना समझा दिया की, समझ ही अब बोझ लगती है
लगता है, संवेदनाओ की मिट्टी कटते-कटते, क्षितिज के पार चली आई है ।
इंसान मैं ही, इंसान को क़ैद कर के रख दे
इस जमाने की, बड़ी ज़ालिम ये रुसवाई है ।
उसका तो फरमान आ गया, कि काफ़िर से ना मिल
मेरा तो सब-कुछ ही छीन लिया, तेरी कैसी ये खुदाई है ॥
