ठहरी हुई मंजिलो से आगे, रास्ता तो चले
मैं थक भी जाऊ, मगर ये होंसला तो चले
अंधेरो मैं खवाब भी डगमगाने लगे हैं
सहर तक, कहीं कोई समां तो जले
ये विराना पलकों को बंज़र न कर दे
साहिल से कोई लहर आकर तो मिले
शब्दों के गलियारे कहीं गुमनाम ना रह जाए
कागज़ के पन्नो से निकल कर जिंदगी तो चले
बाज़ार की रोनक है कि बस बढती ही जाती है
दीवारो से रिश्ते लहू का भी कोई हिसाब तो मिले
फिर काफ़िर को बस्ती से निकल जाने का हुक्म आया है
कभी इन हुक्मगारो की नीयत पर भी कोई गुफ्तगू तो चले
विस्वास की सरहदों पे लाशे तो बो दी हैं हमने
इन लकीरों मैं हकीकत कहाँ दफन है, कुछ पता तो चले
सूखे पत्तो की भीड़ से जमी ढकने लगी है
पतझड़ के मोसम मैं कहीं से हवा तो चले
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3 comments:
hmm...gud one!
bus inka matlab upar se gujar gaya..
बाज़ार की रोनक है कि बढती ही जाती है
दीवारो से रिश्ते लहू का भी कोई हिसाब तो मिले
????????????? :)
Hmmm.... nice...
thanx amar!!
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