Thursday, March 19, 2009

कभी फुरसत में मिलने घर आना तुम ...

कभी फुरसत में मिलने घर आना तुम
और घडी वहीं पर कहीं भूल आना तुम

मैं भी वक़्त के गुजरने की हर सूरत हटा दूगा घर से
बस निगाहों में वही मासूमियत भर लाना तुम

साथ बैठ कर फिर से बचपन के नगमे दोहराएँगे
सूखे हुए फूलों से भरी वो डायरी संग ले आना तुम

फिर से बेफिक्र हो, बादलों के टुकडों मैं शकले ढूँढ कर कहानिया बनाएगे
मिटटी के घरोदो में ढली, आशियाने की वो सूरत, पलकों मैं छुपा लाना तुम

देर तक, ढलती शाम के संग, फिर से कुछ ख्वाब नए बनायेगे
और बेखबर कदमो के निसा बनाते, फिर कोई धुन गुनगुनाना तुम

फिर एक दूजे का हाथ थामे, बचपन की शरारतो के किस्से बार-बार दोहोराएगे
और हँसते हँसते जब दोनों ही रुक जाए, तो फिर बेवजह यू ही हँस जाना तुम

जिक्र चलेगा पुरानी बातो का, और फिर एक दूजे को वही पुराने नामो से बुलाएगे
शायद उस दिन भी बारिश के बूंदे बरसे, और फिर कोई कविता लिख जाना तुम

फिर जब बाते ख़त्म होंगी और आधे अधूरे लफ्ज़ खामोशी मैं घुल जायेगे
तुम्हारे चहरे पे ठहर जाएगी मेरी नज़रे, और मेरी नजरो के संग ठहर जाना तुम

उदासी, खामोशी संग गहराने लगेगी, और जब सवाल लबो पे आकर रुक जायेगे
तब जो बात छुपी है अब तक सब से, वो बात चुपक -चुपके कह जाना तुम

तुम्हारी आखे नम होंगी और तुम्हे बहलाने को मेरी याददाश्त के सब लतीफे कम पड जायेगे
तब मेरी बनाई कोफी पीते, चीनी कम है कहकर, खुद ही मुस्कुरा जाना तुम

और अचानक हम एक दूजे का हाथ थामे, चाँद को देखने छत पर चले जाएगे
तब जी भर कर देख लूगा तुम्हे, बस कुछ पल को चाँद से नज़रे मत हटाना तुम

तुम कहोगी, कितना वक़्त बीत गया कभी सोचा न था, यु इतने साल गुजर जायेगे
मैं कहूगा की अब नीचे चलते हैं, पर जिद कर के कुछ देर ओर वहीं रुक जाना तुम

मैं कहूगा के तुम बिलकुल बदली नहीं, और दोनों वहीं बैठ जायेगे
मैं बस अब सुनता रहूगा, कुछ भी, बस कुछ भी कहते जाना तुम

और धीरे धीरे पुराने सब खवाब फिर से पलकों पे छा जायेगे
तुम्हारी किताब मैं, जो लिख कर मैं भूल गया, फिर वो कविता मुझे सुनाना तुम

तुम कहोगी की चलो अब चलते हैं , वर्ना यहीं पर सो जायेगे
इस बार मैं बैटा रहूगा, और खडी हो कर फिर से बैठ जाना तुम

मैं कहूगा तुम्हे अब तक याद है, मुझे लगा हम सब कुछ भूल जायेगे
सब तुम्हारी तरह भुलक्कड़ नहीं, ये कहकर एक बार फिर हँस जाना तुम

और यू ही धीरे - धीरे बातो मैं खाव्बो को जीते, हम रात को सहर तक जोड़ जाएगे
"वक़्त के संग ढलना नहीं, लम्हे मैं जीना है जिन्दगी", ये कह कर एक बार फिर बिछड़ जाना तुम

फिर सोचता हूँ की शायद संग हमारे अब लम्हे कभी यू न गुजर पायेगे
ये बाते, ये ठहाके, ये आँसू, ये राते - कुछ भी न हों, फिर भी यू ही कभी मिलने आना तुम !

4 comments:

Gaurav Kant Goel said...

abe tu to devd ban gaya.....

very nice....

wow said...

bhut achhi kavita hai dost

Anonymous said...

bahut khoob..ab ye bhi bata do 'vo' kaun hai..jo itna majboor kar gaya..

Parul kanani said...

thanx amar..bahut hi acchi lagi ye...bahut! :)