Monday, February 16, 2009

देव समाज

सिसकती चीखे , तड़पती लाशे,
आओ हम कुछ नोट तराशे !
टूटती आशा मैं छूटती सांसे
आओ एक और मछली जाल में फासे !!

बेबसी में सिसकता है कही आज कोई
चलो सजाये नया एक साज कोई !
जेहरीली हवाओ में है फिर मौत कि बातें
चलो लगाये हम कुछ और ठहाके !!

कापते है हाथ, डरे है चहरे
चलों लगाये इन पर कुछ और पहरे !
मासुम कि आखो में फिर आँसू है आये
चलो आज फिर एक जशन मनाये !!

माँ कि छाती में दूद फिर सुप्त होने लगा है
बिलखता मासूम भूके पेट ही सोने लगा है !
चलो मन्दिर में कुछ दूद चढाये
आओ हम भी कुछ देवतव को पाये !!

मासूम कली फिर बड़ी होने लगी है
पल्को पर अब सपने सजोने लगी है !
चलो सपनो को फिर यथार्थ से मिलाये
द्रौपदी का चीर हरण आज फिर से दोहराये !!

कही किसी से आज हाथ मिलाता है कोई
हमारे बनाये नियमो को झुटलाता है कोई !
चलो धर्म का एक नया तांडव रचाए !
लाशो पर आज फिर एक नयी दीवार उठाये !!

खामोश सिसकिया, कही शोर न हो जाये
मज़बूरी कि जड़े, कही कमजोर न हो जाये !
चलो अज्ञान पर विश्वास कि कुछ परते जमाये
आओ "देव समाज" के कुछ नये नियम बनाये !!

आज फिर लोगो के विश्वास लड़े है
इन्सानियत के हाथो में फिर बरछी-किरपान चदे है !
फिर रोते हुए हाथो ने सिंदूर मला है
श्रोनित आज फिर गंगा से मिला है !
आओ मुखौटे बदल कर कुछ हम भी रो ले
खून सने ये अपने हाथ कुछ धो ले !!

हमारी नशल अब जवान होने लगी है
इन्सानी शकल अब गुलाम होने लगी है !
आओ "आजादी" के कुछ नये तर्क दे
मानव जीवन को कुछ नये अर्थ दे ...!!!

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