Friday, November 7, 2008

क्या लिखू ...

फिर रातो को बारिस की बूंदों संग, दिल मैं गहराया कोई ख्याल लिखू
या फिर कहीं बचपन की पलकों से छलका, खामोश कोई सवाल लिखू !

संकीन मानसिकता के दायरों को, मानवीय सर्जन छमता का जवाब लिखू
या विकास की परिभासा पर लिपटी हुई, स्वार्थ परते बेहिसाब लिखू !

संस्कृति का दामन थामे हुए, लाखो का विस्वास लिखू
या मानव जीवन को गौर्ण करता, देवत्व का अभिश्राप लिखू !

नई उमीदो मैं डूबा हुआ, अमन का पैगाम लिखू
या इतिहास के पन्नो पे बिखरे, लहू के निशान लिखू !

मासूमो के आदर्शो मैं, इन्सानिअत के लिए पनाह लिखू
या खामोसी के संग गहराए, इस सभ्यता के गुनाह लिखू !

इन्सान से इन्सान को जोड़ने के नए होसले लिखू
या लकीरों संग पनपते, मीलो लम्बे फासले लिखू !

सभ्यता के साथ बढ़ते हुए, नए कला के साहकार लिखू
या मानव मूल्यों को बेचते-खरीदते, अर्थतंत्र का व्यापार लिखू !

संगीत की धुन पे थिरकते, मदहोशी मैं छलकते जाम लिखू
या हकीकत की सरहदों पे थक चुकी, उमीदो पर विराम लिखू !

हजारो मीलो लम्बी नहरों से जुड़ते हुए रगिस्तान लिखू
या लम्हा-लम्हा मायूसी मैं डूबी हजारो पलके वीरान लिखू !

नए दौर के नए होसलो संग, उमीदो के बरसात लिखू
या खोकले आदर्शो के संग तनहा, शयाह ये काली रात लिखू !

ख्वाबो की श्याही से कागज़ रंगते, होसलो मैं ढली एक शाम लिखू
या फिर मायूस पलकों से गालो तक लुढ़की, दो बूंदों का अंजाम लिखू ...!!!

1 comment:

Parul kanani said...

thanx for ur comments!!itni acchi hindi hai tumhari..aaj pata chala..too gud!