फिर रातो को बारिस की बूंदों संग, दिल मैं गहराया कोई ख्याल लिखू
या फिर कहीं बचपन की पलकों से छलका, खामोश कोई सवाल लिखू !
संकीन मानसिकता के दायरों को, मानवीय सर्जन छमता का जवाब लिखू
या विकास की परिभासा पर लिपटी हुई, स्वार्थ परते बेहिसाब लिखू !
संस्कृति का दामन थामे हुए, लाखो का विस्वास लिखू
या मानव जीवन को गौर्ण करता, देवत्व का अभिश्राप लिखू !
नई उमीदो मैं डूबा हुआ, अमन का पैगाम लिखू
या इतिहास के पन्नो पे बिखरे, लहू के निशान लिखू !
मासूमो के आदर्शो मैं, इन्सानिअत के लिए पनाह लिखू
या खामोसी के संग गहराए, इस सभ्यता के गुनाह लिखू !
इन्सान से इन्सान को जोड़ने के नए होसले लिखू
या लकीरों संग पनपते, मीलो लम्बे फासले लिखू !
सभ्यता के साथ बढ़ते हुए, नए कला के साहकार लिखू
या मानव मूल्यों को बेचते-खरीदते, अर्थतंत्र का व्यापार लिखू !
संगीत की धुन पे थिरकते, मदहोशी मैं छलकते जाम लिखू
या हकीकत की सरहदों पे थक चुकी, उमीदो पर विराम लिखू !
हजारो मीलो लम्बी नहरों से जुड़ते हुए रगिस्तान लिखू
या लम्हा-लम्हा मायूसी मैं डूबी हजारो पलके वीरान लिखू !
नए दौर के नए होसलो संग, उमीदो के बरसात लिखू
या खोकले आदर्शो के संग तनहा, शयाह ये काली रात लिखू !
ख्वाबो की श्याही से कागज़ रंगते, होसलो मैं ढली एक शाम लिखू
या फिर मायूस पलकों से गालो तक लुढ़की, दो बूंदों का अंजाम लिखू ...!!!
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1 comment:
thanx for ur comments!!itni acchi hindi hai tumhari..aaj pata chala..too gud!
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