Wednesday, November 5, 2008

राह तेरी...

जीवन नहीं है ठहर कहीं, सिर्फ समय सत्र पूरा बिताने को
विचारो के विकास का हर मोती नहीं, सिर्फ धूल मैं मिल जाने को !

जीवन श्रंखलाओ मैं है दूरिया बड़ी, तुझे सेतु कई बनाने हैं
शिखाए कितनी ही बुझ चुकी, तुझे दीपक नए जलाने हैं !

उठा कदम इन राहों की मंजिन, अभी इन निशानों से बहुत दूर है
सूरज ढलता है जहाँ खुशियो की बाहों मैं, वो छितिज़ इस शाम से बहुत दूर है !

उम्मीद के चिरागों को, जिस आगन मैं, सहर तक जलते जाना है
हसरतो की मिटटी से, खवाबो का वो आशियाना तुझे बनाना है .!

वक़्त की ये उडती धुल, जिसे कभी मिटा ना पाए
समय की तपती रेत पर, वो निशा तुझे छोड़ जाना है ...!!!

No comments: