Wednesday, November 5, 2008

कुछ नही ...

पानी संग मिटटी कटती जाती है,
मगर कोई खाई पटती जाती नहीं !
समझ की दरारे तो रिश्ती जाती हैं,
मगर दायरे की लकीरे मिट पाती नही !!

हजारो मीलो फैले फसलो पे तो बरसती हैं घटाए,
मगर कोई बूँद भटकती, इस रेगिस्तान तक आती नही !
जिंदगी नए सवाल तो बुनती जाती है,
मगर कोई जवाब छोड़ कर जाती नही !!

बस मिटटी साचो मैं ढलती जाती है,
मगर कहीं कोई शक्ल उभर पाती नही !
अक्सर शाम ढलते ही रोशन हो जाती हैं,
मगर चिरागों की लो, सहर तक जल पाती नही !!

खामोसी मैं अक्सर जाहिर तो हो जाती है
मगर वो कहानी अब कही जाती नही !
हवाओ की सरसराहट तो सुन जाती है,
मगर उधर से अब कोई सदा आती नही !!

आगन मैं बारिस की बूंदे तो गिर जाती हैं,
मगर मिट्टी से अब वो खुशबू आती नही !
महफिले तो संगीत पर थिरकती जाती हैं,
मगर अब खामोशी कोई धुन गुनगुनाती नही !!

तनहा अक्सर शाम तो ढल जाती है,
मगर खयालो से उदासी ढल पाती नही !
सुबह खिड़की तो खुल जाती है,
मगर कमरे से जिंदगी बाहर निकल पाती नही !!

ख्वाइशे हसरतों संग दायरे लांग कर जाती तो हैं,
मगर उम्मीद का दामन थामे लौट कर आती नही !
हवाए फूलो की महक तो साथ लाती है,
मगर सूखे हुए पत्ते उडा कर ले जाती नही !!

निगाहे अक्सर शून्य मैं तो ठहर जाती है,
मगर कुछ पल आईने के संग ठहर पाती नही !
ये श्याही कागज तो रंगती जाती है,
मगर अंधियारे मैं कोई रंग भर पाती नही ...!!!

3 comments:

El Diablo said...

AAkhtri stanza kaafi achaa tha

गोविंद गोयल, श्रीगंगानगर said...

kitna achchha likhate hain aap
narayan narayan

रचना गौड़ ’भारती’ said...

very good
भावों की अभिव्यक्ति मन को सुकुन पहुंचाती है ।
लिखते रहिए, लिखने वालों की मंज़िल यही है ।
कविता,गज़ल के लिए मेरे ब्लोग पर स्वागत है ।