Tuesday, November 4, 2008

फिर ...

फिर किसी ने वो कहानी कही
जो तमाम रात ढलते-ढलते भी बेजुबानी रही !

यु तो उम्र गुजरी है साथ चलते-चलते
फिर भी कितने फासलों पे ये जिंदगानी रही !

जहाँ भर की खुशिया यु तो हर दौर मैं हासिल रही
फिर भी जैसे, कहीं ख्वाबो पे किसी की निगरानी रही !

यु तो हसरतो की अजमाएशो में आशियाने नए ढलते ही गए
पर कहीं समझ की सरहद पर कुछ सवालो की कुर्बानी रही !

शायद अब तक टूट कर बिखर जाते कुछ रिश्ते
आवाजो के शोर तले कुछ खामोशियों की महेरबानी रही !!!

1 comment:

Parul kanani said...

its u amar......na na na!!
chupe rustam ho...well WORTHLESS CREATIVITY u have..keep it up!!