Sunday, June 1, 2014

वो फिर अकेला छोड गया है ...

वो फिर अकेला छोड गया है
कुछ अनकहे वादे तोड़ गया है

खामोश बरसती बूंदो संग
इस जहन को तपता छोड़ गया है

इन शब्दों के कोलाहल मैं
कुछ खामोशियाँ वो छोड गया है

हज़ारो सवालो के बीच आज
तनहा शाम वो ढलती छोड गया है

रोज कोशिश होती है, उसे पूरा करने की
मेरे पास जो वो, एक कहानी अधूरी छोड़ गया है

इतना तो कभी मैंने, कुछ न संजोया था
जाने मेरे पास वो अपनी, कैसी निशानी छोड गया है

अक्सर भर लेता हूँ उन्हें, बादलो के टुकड़ो मैं
इंद्रधनुष के रंग, जो मेरे पास, वो सारे छोड़ गया है

अक्सर ढूंढ लेता हूँ मैं, खुद मैं ही उसे
मुझमें जाने अपना वो, कितना हिस्सा छोड़ गया है

अक्सर मुझे यूँ ही घेर लेती है उदासी कभी
जाने मेरे पास वो अपनी, कैसी आदत छोड गया है

अक्सर ही आ जाता है, उसका ख्याल बेवजह
जाने यादो की वो, कैसी खिड़की खोल गया है

यु ही मिल जाता है अक्सर, वो ख्वाबो के गलियारों मैं
इन पलको के सिरहाने, वो ये कैसी नींदे छोड़ गया है

नज़रे हैं की हर आहत पे, उसी को ढूँढ़ती रहती हैं
एक दिन फिर लौट आने की, ये कैसी उम्मीदें छोड़ गया हैं

शायद कुछ बूंदे टिकी हैं पलको पे, उसके फिर मिल जाने तक
इस सहारा में बारिश की, वो एक प्यास छोड़ गया है

जिंदगी जब भी मिली मुझसे, बस चुपचाप ही बैठी रही
इसकी ख़ामोशी मैं घुल जाने का, वो एक अहसास छोड़ गया है  ॥

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